सुप्रीम कोर्ट बनाम नासिक मुआवजा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2025 को नासिक नगर निगम से जुड़े एक लंबे चले विवाद में फैसला सुनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश को खारिज कर दिया और भू-स्वामी के लिए 20.20 करोड़ रुपये से अधिक का बढ़ा हुआ मुआवजा बहाल कर दिया। केस का मूल पक्ष प्रद्युम्न मुकुंद कोकिल बनाम नासिक नगर निगम था, और फैसले में मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई तथा जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच ने संवैधानिक और वैधानिक मापदण्डों का विस्तृत परीक्षण करते हुए अलग-अलग तर्कों पर अपना निर्णय दिया।
कथा की शुरुआत 1972 की उस घटना से होती है जब नासिक रोड-देवलाली नगर परिषद ने देवलाली गाँव की एक जमीन का हिस्सा सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव पारित किया था। बिना औपचारिक अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी किये नगर परिषद ने 3,700 वर्ग मीटर जमीन पर कब्जा कर लिया, जबकि बाद की अधिसूचना में केवल 10,100 वर्ग मीटर को अधिग्रहित घोषित किया गया। वर्षों के मुकदमों के सापेक्ष पृष्ठभूमि में यह जमीन कई बार विवादों में आई; 1998 में मूल मालिक ने MRTP अधिनियम के तहत आरक्षण को समाप्त कर दिया बताया, पर निगम ने विकास की अनुमति से इनकार कर दिया और कब्जे पर बने रहने का दावा जारी रखा।
प्रद्युम्न कोकिल ने 29 जुलाई 2011 को उसी परस्ल का पंजीकृत विक्रय पत्र के ज़रिए 1.17 करोड़ रुपये में अधिग्रहण किया। बाद में राज्य सरकार और न्यायालयों की कतारबद्ध सुनवाईयों के बाद 2017 में अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ी और विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने 8,69,46,650 रुपये का अवार्ड पारित किया। कोकिल ने इस राशी को अस्वीकार कर रेफरेंस दायर किया। रेफरेंस प्राधिकरण ने 2013 के भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्राधिकरण अधिनियम की धारा 26 के अनुसार बाजार मूल्य का आकलन करते हुए मुआवजे को 20,20,11,533 रुपये तक बढ़ा दिया और साथ ही 1972 से अवैध कब्जे के लिए एक बहुत बड़ी रकम किराये के मुआवजे के रूप में प्रस्तावित की।
हाईकोर्ट ने रेफरेंस प्राधिकरण के इस बढ़ाए हुए अवॉर्ड और विशेषकर किराये के मुआवजे को चुनौती देते हुए मूल SLAO अवॉर्ड को बहाल कर दिया। उसी हाईकोर्ट के विरोधी रुख को सुप्रीम कोर्ट ने इस बार उलटा माना। अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि रेफरेंस प्राधिकरण ने 2013 के नियमों और पारदर्शिता को अपनाकर ठीक तरह से बाजार मूल्य का निर्धारण किया, जबकि SLAO ने गलत तरीके से कुछ दरों पर निर्भरता दिखायी। दूसरी ओर निगम ने कहा कि SLAO का मूल्यांकन उचित था और किराये का मुआवजा 2013 अधिनियम से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों बिन्दुओं का अलग-अलग परीक्षण किया। पहले बिन्दु में कोर्ट ने माना कि रेफरेंस प्राधिकरण ने वैधानिक पद्धति के अनुरूप पिछले तीन वर्षों के पंजीकृत विक्रय पत्रों का प्रयोग कर बाजार मूल्य का सही निर्धारण किया। दूसरे बिन्दु में कोर्ट ने कब्जे के तथ्यों की बारीकी से पड़ताल की और पाया कि मूल मालिक को संपत्ति के उपयोग या कब्जे से पूरी तरह वंचित नहीं किया गया था। निर्णय ने विशेष रूप से उस खरीद तारीख 29 जुलाई 2011 के पहले की अवधि के लिए किराये के दावे को कमजोर बताया।
फिर भी न्यायालय ने 2013 अधिनियम की धारा 28 के वे प्रावधान ध्यान में रखे जो इक्विटी और न्याय के आधार पर प्रभावित पक्षों के हित में अतिरिक्त राहत की गुंजाइश देते हैं। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता ने 2011 में जमीन के लिए भुगतान किया था पर उसे वास्तविक उपयोग का अवसर 2017 तक नहीं मिला। इसलिए उसे अपने निवेश पर उस राज्य-कब्जे की अवधि के लिए अंतःकालीन लाभ या ब्याज के रूप में मुआवजा मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर 29 जुलाई 2011 से 8 मई 2017 के मध्य के लिए 1.17 करोड़ पर प्रति वर्ष 8% की दर से ब्याज देने का आदेश दिया।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह था कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा अपीलकर्ता के खिलाफ की गयी प्रतिकूल व्यक्तिगत टिप्पणियों और उस पर लगाई गयी 10 लाख रुपये की लागत को अनुचित मानते हुए रद्द कर दिया। इस तरह उच्चतम न्यायालय ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर रेफरेंस प्राधिकरण के 18 मार्च 2021 के अवॉर्ड को बहाल किया, 1972 से किराये के दावे को खारिज कर दिया और 2011 से 2017 की अवधि के लिए निवेश पर ब्याज के रूप में अंतःकालीन लाभ सुनिश्चित किया।
यह निर्णय संपत्ति अधिकारों, अधिग्रहण मूल्यांकन की विधिक प्रक्रियाओं और प्रभावित किसानों या भू-स्वामियों के हित में ‘इक्विटी और न्याय’ के सिद्धांतों के अनुप्रयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि तकनीकी वैधानिक ढाँचे के साथ-साथ वास्तविक स्थिति, कब्जे के हालात और खरीदार द्वारा भुगतान की गई राशि का औचित्य भी मुआवजे के निर्धारण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। फैसले से यह प्रस्तावित संदेश भी जाता है कि अधिग्रहण के समय और बाद में पारदर्शिता, सही तरीके से मूल्यांकन और प्रभावित पक्षों के कदमों के ऐतिहासिक तथ्य न्यायालयों द्वारा ठोस तौर पर आंकें जाएंगे।
Citation : 2025 Local Law (SC) 1236
Case Details : SLP (C) NO.18305 OF 2023, PRADYUMNA MUKUND KOKIL VS NASHIK MUNICIPAL CORPORATION AND OTHERS