छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एचआईवी संक्रमित महिला की पहचान उजागर करने पर जताई नाराजगी, 2 लाख रुपये मुआवजे का आदेश

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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एचआईवी मरीज की पहचान उजागर करने पर दिखाई सख्ती, 2 लाख मुआवजा

रायपुर के डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल में एचआईवी संक्रमित महिला की पहचान उजागर करने की घटना पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की अगुवाई वाली बेंच ने राज्य सरकार से जवाब मांगते हुए कहा कि यह कृत्य न केवल अमानवीय है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित गरिमा और निजता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की चिकित्सीय जानकारी गोपनीय होती है और उसे सार्वजनिक करना असंवेदनशीलता के साथ-साथ भेदभाव की जड़ बन सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की लापरवाही न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि यह पीड़ित व्यक्ति के आत्मसम्मान पर भी सीधा प्रहार करती है।

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता यशवंत सिंह ने अदालत को बताया कि एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों की पहचान उजागर न करने के नियम पहले से लागू हैं, और सभी चिकित्सा संस्थानों को इसका सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने माना कि अस्पताल कर्मियों की लापरवाही से यह घटना हुई है।

कोर्ट ने इस मामले को “अत्यंत अमानवीय और असंवेदनशील” बताते हुए पीड़िता को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही, अदालत ने दोषी कर्मियों पर विभागीय कार्रवाई करने और जांच पूरी कर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए।

यह मामला तब सामने आया जब अंबेडकर अस्पताल के गायनेकोलॉजी और नर्सरी वार्ड के बीच एक पोस्टर लगाया गया था, जिस पर लिखा था—“बच्चे की मां एचआईवी पॉजिटिव है।” जब नवजात का पिता अपने बच्चे को देखने पहुंचा और उसने यह पोस्टर देखा, तो वह भावुक होकर रो पड़ा। यह दृश्य जल्द ही अस्पताल प्रशासन और मीडिया की नजर में आया, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा।

हाईकोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान (suo motu cognizance) लेते हुए कहा कि इस तरह का व्यवहार न केवल मानवता के मूल मूल्यों का अपमान है, बल्कि एचआईवी संक्रमित लोगों के प्रति सामाजिक भेदभाव को और गहरा करता है। अदालत ने चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई गईं तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

यह फैसला न केवल पीड़िता के लिए न्याय सुनिश्चित करता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि चिकित्सा गोपनीयता और गरिमा का अधिकार हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, और किसी भी परिस्थिति में इसका उल्लंघन अस्वीकार्य है।

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