सुप्रीम कोर्ट झारखंड शिक्षक बर्खास्तगी फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में झारखंड के दो इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षकों की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। अदालत ने पाया कि शिक्षकों को ऐसे आरोप के लिए दंडित किया गया, जिसका उल्लेख उन्हें दिए गए कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) में कभी किया ही नहीं गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना उचित प्रक्रिया (Due Process) का गंभीर उल्लंघन है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने इस मामले में फैसला सुनाया।
मामला 2015 की नियुक्तियों से जुड़ा है, जब अपीलकर्ता रवि और प्रेम लाल को इंटरमीडिएट प्रशिक्षित शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। लेकिन कुछ ही महीनों बाद, 2016 में उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया गया।
मूल कारण बताओ नोटिस में यह आरोप लगाया गया था कि दोनों शिक्षकों ने पात्रता के लिए आवश्यक न्यूनतम 45% अंक प्राप्त नहीं किए। इस पर शिक्षकों ने जवाब दिया कि वे अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग से हैं, इसलिए उन्हें केवल 40% अंक की आवश्यकता है, और उन्होंने वह अंक हासिल कर लिए हैं।
हालांकि नियोक्ता ने इस बचाव को स्वीकार करने के बजाय एक नया और अनकहा आरोप पेश कर दिया। कहा गया कि शिक्षकों द्वारा 40% अंकों की गणना गलत है, क्योंकि यदि व्यावसायिक विषयों (vocational marks) को बाहर रखा जाए तो उनके अंक 40% से कम हो जाते हैं, जिससे वे अयोग्य ठहरते हैं।
महत्वपूर्ण यह रहा कि इस नए आरोप के बारे में शिक्षकों को कोई नोटिस नहीं दिया गया और उन्हें अपनी बात रखने का अवसर भी नहीं मिला। इसके बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
दोनों ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। लेकिन खंडपीठ (Division Bench) ने इस फैसले को पलट दिया। इसके खिलाफ शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ का आदेश रद्द करते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति को किसी विशेष आरोप के लिए नोटिस दिया गया हो और उसने उस आरोप के खिलाफ सफलतापूर्वक अपना बचाव किया हो, तो उसे किसी अन्य अप्रकट (uncommunicated) आरोप के लिए दंडित करना कानूनन गलत है।
जस्टिस दत्ता ने अपने फैसले में लिखा –
“यह वैसी ही स्थिति है, जहां नोटिस पाने वाला व्यक्ति अपने खिलाफ लगाए गए आरोप का सफलतापूर्वक बचाव करता है, लेकिन उसे किसी अन्य आरोप के लिए दंडित कर दिया जाता है, जिसके संबंध में उसे कोई नोटिस नहीं दिया गया था। ऐसे मामलों में यह उचित प्रक्रिया का उल्लंघन है और इससे जारी कोई भी आदेश टिक नहीं सकता।”
कोर्ट ने आगे कहा कि प्रतिवादियों ने शिक्षकों की सेवाएं बिना उचित कारण और मनमाने तरीके से समाप्त कीं। इसलिए बर्खास्तगी के आदेश अवैध हैं और उन्हें रद्द किया जाता है।
अदालत ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता रवि और प्रेम लाल को उनकी मूल नियुक्ति तिथि (दिसंबर 2015) से निरंतर सेवा में माना जाएगा, जैसे कि उनकी सेवाएं कभी समाप्त ही नहीं हुई हों। उन्हें सभी बकाया वेतन, सेवा लाभ और वरिष्ठता दी जाएगी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि पदोन्नति के लिए अनुभव की गणना में बर्खास्तगी की अवधि शामिल नहीं की जाएगी, क्योंकि शिक्षण का वास्तविक अनुभव विद्यार्थियों को पढ़ाने से प्राप्त होता है।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार कर लिया और शिक्षकों को पूर्ण राहत प्रदान की।