झारखंड हाईकोर्ट ने अधिवक्ता महेश तिवारी के खिलाफ स्वतः संज्ञान कर अवमानना कार्यवाही शुरू की

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झारखंड हाईकोर्ट महेश तिवारी अवमानना

झारखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार को अधिवक्ता महेश तिवारी के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी। यह कार्रवाई तब हुई जब 16 अक्टूबर को न्यायमूर्ति राजेश कुमार की अदालत में तिवारी और जज के बीच हुई तीखी बहस का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और उच्च न्यायालय ने उस घटना को गंभीरता से लिया। अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए पांच सदस्यों की पूर्ण पीठ बनाई और तिवारी को तीन सप्ताह के भीतर अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

घटना की पृष्ठभूमि साधारण थी: तिवारी अपने मुवक्किल के बिजली कनेक्शन के पुनःस्थापन के लिए बहस कर रहे थे, जिसका कट जाना बकाया बिलों के कारण बताया गया। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने बताया कि मुवक्किल 25,000 रुपये जमा करने के लिए तैयार है, जबकि जज ने न्यायिक मिसालों का हवाला देते हुए कहा कि कुल बकाया राशि का 50 प्रतिशत जमा होना चाहिए। दोनों पक्षों के बीच अंततः 50,000 रुपये जमा करने पर सहमति बन गई और मामला सुलझ गया। लेकिन उसी के बाद हुई बातचीत ने तनाव पैदा कर दिया।

मामला इसलिए भड़क उठा क्योंकि सुनवाई खत्म होने के बाद न्यायाधीश ने कथित तौर पर अधिवक्ता के बहस करने के अंदाज पर टिप्पणी की और अदालत में मौजूद झारखंड स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष से इस बात का संज्ञान लेने को कहा। तिवारी ने बेंच के पास जाकर कहा कि वे “अपने तरीके से बहस” करेंगे और जज ने उन्हें “सीमा पार न करने” की चेतावनी दी। इस पूरी बहस का वीडियो रिकॉर्ड हो गया और बाद में वायरल हो गया, जिसने न्यायिक और वकिल समुदाय दोनों में तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी।

वायरल वीडियो को देखते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की गंभीरता से समीक्षा की। चीफ जस्टिस तारलोक सिंह चौहान की अध्यक्षता वाली पूर्ण पीठ में न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद, न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय, न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति राजेश शंकर शामिल थे। सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट रूप से वीडियो के सार्वजनिक होने और इससे उत्पन्न होने वाले प्रभाव का उल्लेख करते हुए तिवारी से औपचारिक जवाब मांगा। अदालत ने कहा कि वकीलों और न्यायालय के बीच आदर और अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है।

कानूनी आचरण और अदालत के व्यावहारिक तौर-तरीकों पर यह मामला एक बड़ी चर्चा का विषय बन गया है। वकीलों का मानना है कि कर्तव्य की वकालत करते समय कभी-कभी आक्रामक व्यवहार आ सकता है, वहीं न्यायपालिका का रुख यह है कि अदालत की गरिमा और अनुशासन दोनों सर्वोपरि हैं। सोशल मीडिया पर वायरल रिकॉर्डिंग ने यह बहस और तीव्र कर दी है कि कोर्टरूम की कार्रवाई सार्वजनिक या अर्ध-जनसाधारण माध्यमों पर किस हद तक आने योग्य है और किन परिस्थितियों में बैलेंस बनाये रखना चाहिए।

अभी प्रक्रिया चल रही है और अदालत ने तिवारी को अपना जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है; उसके बाद अदालत आवश्यक कदम उठाएगी। इस बीच, मामला न्यायिक आचरण, मीडिया में प्रसारण और वकील-न्यायाधीश संबंधों पर पेशेवर बहस की नई पढ़ाई के रूप में देखा जा रहा है। जो भी निर्णय आएगा, वह न केवल इस एक घटना का निपटारा करेगा बल्कि भविष्य में अदालत और वकील समुदाय के व्यवहार के मानदंडों पर भी असर डालेगा।

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