सुप्रीम कोर्ट ने 4 मार्च 2024 को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी सांसद या विधायक रिश्वत लेने या देने के मामले में संवैधानिक प्रतिरक्षा का दावा नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 105(2) और 194(2) में दी गई प्रतिरक्षा केवल वैध विधायी कार्यों के लिए है, न कि भ्रष्टाचार जैसे अपराधों के लिए। मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना, एम.एम. सुंदरेश, पी.एस. नरसिम्हा, जे.बी. परदीवाला, पी.वी. संजय कुमार और मनोज मिश्रा शामिल थे, ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। इस निर्णय के साथ अदालत ने 1998 के पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य मामले के उस पुराने फैसले को पलट दिया, जिसमें बहुमत ने कहा था कि संसद सदस्य सदन में दिए गए भाषण या वोट से संबंधित कार्यों के लिए प्रतिरक्षा प्राप्त करते हैं।
यह मामला झारखंड के झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की विधायक सीता सोरेन से जुड़ा था। वर्ष 2012 में उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने राज्यसभा चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार से पैसे लेकर उसके पक्ष में वोट देने का वादा किया। हालांकि, खुले मतदान प्रणाली के चलते उन्होंने अंततः अपनी पार्टी के उम्मीदवार को वोट दिया। इसके बाद उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मामला दर्ज किया गया। सीता सोरेन ने झारखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की और कहा कि बतौर विधायक उन्हें संविधान के अनुच्छेद 194(2) के तहत प्रतिरक्षा प्राप्त है, जिसके अनुसार विधायक सदन में कही गई बातों और डाले गए वोट के लिए अदालत में जवाबदेह नहीं होते।
झारखंड उच्च न्यायालय ने यह माना कि यदि कोई विधायक रिश्वत लेता है लेकिन रिश्वत की शर्तों के अनुसार वोट नहीं डालता, तो उसे प्रतिरक्षा नहीं मिलेगी। न्यायालय ने यह व्याख्या 1998 के पी.वी. नरसिम्हा राव फैसले के आधार पर की थी, जिसमें कहा गया था कि जिन्होंने रिश्वत लेकर मतदान किया, उन्हें प्रतिरक्षा प्राप्त है, लेकिन जिन्होंने रिश्वत ली और मतदान नहीं किया, उन पर अभियोजन चलाया जा सकता है। उच्च न्यायालय ने सीता सोरेन की याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले यह मामला दो न्यायाधीशों की पीठ को सौंपा, जिसने इसे संवैधानिक महत्व का प्रश्न मानते हुए तीन न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा। बाद में मामला पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास पहुँचा, जिसने कहा कि पी.वी. नरसिम्हा राव निर्णय की समीक्षा बड़ी पीठ द्वारा की जानी चाहिए क्योंकि यह मामला सार्वजनिक महत्व और लोकतांत्रिक नैतिकता से जुड़ा है। अंततः, इसे सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंपा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिश्वतखोरी को किसी भी रूप में संसदीय विशेषाधिकार का हिस्सा नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 105(2) और 194(2) का उद्देश्य विधायी कार्यों को स्वतंत्र रूप से संचालित करने की गारंटी देना है, न कि ऐसे कार्यों को संरक्षण देना जो लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करते हैं। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने अपने निर्णय में कहा कि लोकतांत्रिक शासन की नींव जनता के विश्वास पर टिकी है, और यदि प्रतिनिधि स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त हों, तो वह विश्वास खत्म हो जाता है। इसलिए, रिश्वत लेना या देना किसी भी परिस्थिति में संवैधानिक प्रतिरक्षा के अंतर्गत नहीं आ सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि यह प्रतिरक्षा केवल उन कार्यों तक सीमित है जो सीधे तौर पर विधायी प्रक्रिया से जुड़े हों — जैसे सदन में भाषण देना, बहस में भाग लेना या मतदान करना। लेकिन यदि इन कार्यों से पहले कोई भ्रष्ट आचरण हुआ हो, जैसे रिश्वत लेना, तो वह संविधान की सुरक्षा के दायरे से बाहर रहेगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे अपराधों को संसदीय विशेषाधिकार के आवरण में छिपाया नहीं जा सकता क्योंकि यह न केवल विधायी नैतिकता बल्कि संविधान के मूल सिद्धांतों का भी उल्लंघन होगा।
इस निर्णय ने भारतीय संसदीय लोकतंत्र में जवाबदेही की अवधारणा को और मजबूत किया है। अदालत ने यह भी कहा कि विधायकों और सांसदों के लिए यह फैसला एक सख्त संदेश है कि संसद या विधानसभा के अंदर और बाहर, कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होता है। किसी जनप्रतिनिधि के लिए यह मान लेना कि सदन का सदस्य होने के कारण उसे कानून से छूट प्राप्त है, संविधान की भावना के खिलाफ है।
सीता सोरेन बनाम भारत संघ का यह फैसला न केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि संसदीय विशेषाधिकार का उपयोग केवल वैध विधायी कार्यों की रक्षा के लिए किया जा सकता है, न कि भ्रष्ट आचरण के लिए। इस निर्णय ने यह सुनिश्चित किया है कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और नैतिकता भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का अभिन्न हिस्सा बनी रहे।
Case Details (Legislative Immunity) : Criminal Appeal No. 451 of 2019, Sita Soren v. Union of India
Citation : 2024 Local Law (SC) 161
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