नई दिल्ली, 20 जनवरी 2021: सुप्रीम कोर्ट ने बेघर फाउंडेशन बनाम जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) मामले में 2018 के आधार फैसले के खिलाफ दाखिल समीक्षा याचिकाओं को 4:1 के बहुमत से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल कानून में बाद में आए बदलाव या किसी बड़ी पीठ के निर्णय को आधार बनाकर समीक्षा नहीं की जा सकती। इस फैसले से आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का लक्षित वितरण) अधिनियम, 2016 की संवैधानिक वैधता एक बार फिर कायम रही।
पाँच न्यायाधीशों की पीठ — जिसमें न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, डी.वाई. चंद्रचूड़, अशोक भूषण, एस. अब्दुल नज़ीर और बी.आर. गवई शामिल थे, ने 11 जनवरी 2021 को चैंबर में सुनवाई की थी। बीस जनवरी को सुनाए गए निर्णय में बहुमत की राय रही कि 2018 के आधार फैसले में कोई प्रत्यक्ष गलती नहीं थी और यह समीक्षा के योग्य नहीं है।
हालांकि, न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने असहमति जताते हुए कहा कि यह निर्णय अभी खारिज नहीं किया जाना चाहिए था क्योंकि रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक (2019) में सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं माना था कि आधार फैसले में धन विधेयक की व्याख्या पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई थी। उन्होंने कहा कि जब यही मुद्दा सात न्यायाधीशों की बड़ी पीठ के पास लंबित है, तब समीक्षा को ठुकराना “संवैधानिक त्रुटि” होगा।
2018 के आधार फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 से यह निर्णय दिया था कि आधार अधिनियम संवैधानिक रूप से वैध है। न्यायालय ने माना कि आधार योजना नागरिकों की निजता का उल्लंघन नहीं करती और इसका उद्देश्य सरकारी सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं का लक्षित वितरण सुनिश्चित करना है। हालांकि, अदालत ने कुछ प्रावधानों की सीमित व्याख्या की और निजी कंपनियों द्वारा आधार डेटा के उपयोग पर रोक लगाई थी।
उस फैसले में दो प्रमुख सवाल उठे थे। पहला, क्या लोकसभा अध्यक्ष द्वारा किसी विधेयक को “धन विधेयक” के रूप में प्रमाणित करने का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है? और दूसरा, क्या आधार अधिनियम वास्तव में संविधान के अनुच्छेद 110 के तहत धन विधेयक के रूप में वैध था?
बहुमत की राय थी कि अध्यक्ष का निर्णय सामान्यतः अंतिम होता है, लेकिन यदि प्रमाणन संविधान का उल्लंघन करता हो, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। आधार अधिनियम के संदर्भ में बहुमत ने कहा कि इसमें धन विधेयक के तत्व मौजूद हैं, इसलिए इसका प्रमाणीकरण वैध था। वहीं न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने मतभेद जताते हुए कहा था कि यह अधिनियम केवल वित्तीय मामलों तक सीमित नहीं था, बल्कि नागरिक अधिकारों को प्रभावित करता था, इसलिए इसे धन विधेयक के रूप में पारित करना गलत था।
2019 में आए रोजर मैथ्यू फैसले ने आधार अधिनियम की इस व्याख्या पर सवाल उठाया था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आधार निर्णय में धन विधेयक के प्रश्न पर “पर्याप्त विचार नहीं किया गया” और इसे “अत्यधिक उदार” तरीके से व्याख्यायित किया गया। इसलिए यह मुद्दा अब सात न्यायाधीशों की बड़ी पीठ को भेजा गया है, जो भविष्य में इसका अंतिम निपटारा करेगी।
फिर भी, 2021 में अदालत ने कहा कि जब तक कोई स्पष्ट त्रुटि या तथ्यात्मक भूल साबित न हो, तब तक पहले के फैसले की समीक्षा नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी दोहराया कि बाद के निर्णय या कानून में बदलाव समीक्षा का वैध आधार नहीं बनते। इस प्रकार, आधार अधिनियम की संवैधानिक वैधता बरकरार रही और सरकार द्वारा आधार को कल्याणकारी योजनाओं के वितरण से जोड़ने की प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति बनी रही।
Case Details (Aadhaar Review) : WRIT PETITION (CIVIL) NO. 494 OF 2012, Beghar Foundation through its Secretary and Anr. vs Justice K.S. Puttaswamy (Retd.) and Ors.