सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की संवैधानिकता पर बहस : एन. राम, प्रशांत भूषण और अरुण शौरी की याचिका

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सुप्रीम कोर्ट में एन. राम व अन्य बनाम भारत संघ (N. Ram & Ors v. Union of India) मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायालय की अवमानना की सीमाओं के बीच संतुलन से जुड़ा एक अहम संवैधानिक प्रश्न बन गया। यह मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण और ट्विटर इंडिया के खिलाफ स्वतः संज्ञान (suo moto) लेते हुए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की। इसका कारण थे वे दो ट्वीट जो प्रशांत भूषण ने न्यायपालिका और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को लेकर किए थे।

मामले के पक्षकारों में वरिष्ठ पत्रकार एन. राम, सार्वजनिक हित याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण और पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ पत्रकार अरुण शौरी शामिल थे। इन सभी ने संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(सी)(i) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। यह धारा कहती है कि अगर कोई व्यक्ति न्यायालय की प्रतिष्ठा को “कलंकित या नीचा दिखाने” वाला कोई कार्य या वक्तव्य करता है, तो उसे आपराधिक अवमानना माना जाएगा।

22 जुलाई 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को अवमानना नोटिस जारी किया था। यह नोटिस एक तृतीय पक्ष द्वारा दायर याचिका के आधार पर जारी हुआ था, जिसे बाद में अदालत ने स्वतः संज्ञान में बदल दिया। पहले ट्वीट में प्रशांत भूषण ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को एक हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल पर बिना हेलमेट के सवारी करते हुए दिखाया था और यह सवाल उठाया था कि लॉकडाउन के दौरान न्यायपालिका ठप पड़ी थी। दूसरे ट्वीट में उन्होंने टिप्पणी की थी कि पिछले छह वर्षों में देश में लोकतंत्र के पतन में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका रही है। अदालत ने इन बयानों को न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला माना और अवमानना की कार्यवाही शुरू की।

इस बीच, 31 जुलाई 2020 को एन. राम, प्रशांत भूषण और अरुण शौरी ने एक अलग रिट याचिका दायर की जिसमें उन्होंने आपराधिक अवमानना के प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। उनका तर्क था कि “न्यायालय की प्रतिष्ठा को कलंकित करना या नीचा दिखाना” जैसी अस्पष्ट और व्यापक भाषा का दुरुपयोग हो सकता है। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान न्यायपालिका की आलोचना को अपराध बना देता है और इसका परिणाम एक “ठंडा प्रभाव” (chilling effect) होता है, जिससे पत्रकार, अधिवक्ता और नागरिक स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त करने से डरते हैं।

एन. राम ने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है और न्यायालयों की आलोचना भी उसी का हिस्सा है। अरुण शौरी ने कहा कि इस तरह के प्रावधानों से अभिव्यक्ति का मूल अधिकार कमजोर होता है और न्यायपालिका को लोकतांत्रिक जवाबदेही से मुक्त नहीं किया जा सकता। प्रशांत भूषण ने कहा कि उनका उद्देश्य अदालतों की आलोचना करना नहीं था, बल्कि न्यायिक सुधार की दिशा में विचार प्रकट करना था।

इस याचिका की सुनवाई पहले 10 अगस्त 2020 को न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जोसेफ की पीठ के समक्ष तय थी, लेकिन बाद में इसे कारण सूची से हटा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने स्पष्ट किया कि चूंकि एक अन्य पीठ पहले से अवमानना से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी, इसलिए यह मामला गलती से सूचीबद्ध हो गया था।

13 अगस्त 2020 को मामला न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की तीन-न्यायाधीशीय पीठ के समक्ष आया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने यह अनुरोध किया कि उन्हें याचिका वापस लेने की अनुमति दी जाए ताकि वे भविष्य में इसे किसी उच्च न्यायालय में दायर कर सकें। सुप्रीम कोर्ट ने यह अनुमति दे दी और मामला बिना किसी निर्णय के वापस ले लिया गया।

इस पूरे प्रकरण ने यह सवाल उठाया कि क्या भारत में आपराधिक अवमानना का प्रावधान लोकतांत्रिक समाज में उचित है? याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जिस धारा के तहत अवमानना तय होती है, उसकी भाषा इतनी अस्पष्ट है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का औजार बन सकती है। वहीं, अदालत का मानना था कि न्यायपालिका की गरिमा और जनविश्वास को बनाए रखना भी लोकतंत्र के लिए उतना ही आवश्यक है।

Case Details : WP (C) 791 of 2020

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