सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया मराठा आरक्षण कानून, कहा – 50% की सीमा नहीं तोड़ी जा सकती

Supreme Court of India Supreme Court of India

नई दिल्ली, 5 मई 2021: सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार के सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग अधिनियम, 2018 (SEBC Act, 2018) को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया। इस कानून के तहत मराठा समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ दिया गया था। अदालत ने कहा कि यह अधिनियम संविधान द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा का उल्लंघन करता है और 102वें संविधान संशोधन के प्रावधानों के भी खिलाफ है।

मराठा आरक्षण की मांग महाराष्ट्र में कई दशकों से चली आ रही थी। 2014 में राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर मराठा समुदाय को शिक्षा और सरकारी सेवाओं में 16 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसी वर्ष इस अध्यादेश पर रोक लगा दी, और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद सरकार ने 2018 में नया कानून बनाया, जिसके तहत मराठाओं को 16 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। यह सीमा न केवल महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों से अधिक थी, जिसमें क्रमशः 12 और 13 प्रतिशत आरक्षण की बात कही गई थी, बल्कि इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा का भी उल्लंघन था।

इस कानून को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल की गईं। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह अधिनियम न केवल आरक्षण की सीमा से अधिक है, बल्कि मराठा समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्गों से अलग एक नई श्रेणी बनाकर संविधान के अनुच्छेद 14, 15(4) और 16(4) का उल्लंघन करता है। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग की रिपोर्ट में मराठा समाज की पिछड़ेपन को सिद्ध करने के लिए कोई ठोस और वैज्ञानिक आंकड़े नहीं थे।

महाराष्ट्र सरकार ने अपनी ओर से कहा कि राज्य में मराठा समुदाय की आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है, किसानों की आत्महत्याएं बढ़ रही हैं, और ऐसी असाधारण परिस्थितियों में आरक्षण देना उचित है। जून 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस अधिनियम को वैध ठहराया, लेकिन आरक्षण की दर घटाकर 12 प्रतिशत (शिक्षा में) और 13 प्रतिशत (सरकारी सेवाओं में) कर दी।

राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संविधान पीठ के पास भेजा क्योंकि यह संविधान की व्याख्या से जुड़े गंभीर सवालों को उठाता था। संविधान पीठ जिसमें न्यायमूर्ति अशोक भूषण, एस. अब्दुल नजीर, एल. नागेश्वर राव, हेमंत गुप्ता और एस. रविंद्र भट शामिल थे ने छह प्रमुख प्रश्न तय किए, जिनमें यह भी शामिल था कि क्या आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा पर पुनर्विचार किया जा सकता है और क्या 102वां संविधान संशोधन राज्यों की यह शक्ति खत्म करता है कि वे स्वयं पिछड़े वर्गों की पहचान कर सकें।

5 मई 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा पर पुनर्विचार की कोई आवश्यकता नहीं है और न ही महाराष्ट्र सरकार यह दिखा सकी कि कोई असाधारण परिस्थिति थी जो इस सीमा को तोड़ने को उचित ठहराए। अदालत ने कहा कि गैikwad आयोग की रिपोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णय “असाधारण स्थिति” साबित करने में विफल रहे हैं। इसलिए, मराठा समुदाय को दिए गए आरक्षण के प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 102वां संविधान संशोधन राज्यों से पिछड़े वर्गों की पहचान करने की शक्ति केंद्र को सौंपता है। अब केवल राष्ट्रपति ही पिछड़े वर्गों की सूची अधिसूचित कर सकते हैं, और संसद ही उसमें संशोधन कर सकती है। राज्य सरकारें केवल अनुशंसा कर सकती हैं। इस मुद्दे पर न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव, हेमंत गुप्ता और एस. रविंद्र भट बहुमत में रहे, जबकि न्यायमूर्ति अशोक भूषण और अब्दुल नजीर ने मतभेद जताया और कहा कि संसद का उद्देश्य राज्यों की शक्ति छीनना नहीं था।

इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इंद्रा साहनी मामला अब भी मान्य है और आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा संविधान का अभिन्न हिस्सा है। महाराष्ट्र SEBC अधिनियम, 2018 में मराठा समुदाय को दिया गया आरक्षण असंवैधानिक घोषित कर दिया गया और उसे रद्द कर दिया गया।

Case Details (Maratha Reservation) : CIVIL APPEAL NO.3123 of 2020, Dr Jaishri Laxmanrao Patil vs Jaishri Laxmanrao Patil v Chief Minister, Maharashtra – REVIEW PETITION (C) NO.592 OF 2021

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *