सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर विकास प्राधिकरण बनाम मनोहरलाल मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 24(2) की सही व्याख्या को स्पष्ट किया। यह मामला इस सवाल पर केंद्रित था कि क्या राज्य द्वारा भूमि मालिकों को मुआवजा न देने से भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही अपने आप समाप्त हो जाती है। अदालत की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, इंदिरा बनर्जी, विनीत सरन, एम.आर. शाह और एस. रविंद्र भट शामिल थे, ने 6 मार्च 2020 को फैसला सुनाया कि केवल मुआवजे का भुगतान न होने से अधिग्रहण समाप्त नहीं माना जा सकता।
यह विवाद 2013 के भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम की धारा 24(2) से जुड़ा था। इस धारा में कहा गया है कि यदि किसी भूमि अधिग्रहण का निर्णय पांच वर्ष या उससे अधिक समय पहले लिया गया है और अब तक या तो भूमि का स्वामित्व राज्य ने नहीं लिया है या मुआवजा भुगतान नहीं किया गया है, तो अधिग्रहण की कार्यवाही समाप्त मानी जाएगी। विवाद की जड़ “या” शब्द था, क्योंकि इसका अर्थ तय करना जरूरी था। क्या यह “या” विकल्प के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, या इसे संयोजक “और” के अर्थ में देखा जाना चाहिए? केंद्र सरकार का मत था कि इसे “और” के रूप में समझा जाए, यानी जब तक राज्य न तो भूमि का स्वामित्व ले और न ही मुआवजा दे, तब तक ही अधिग्रहण समाप्त होगा।
अदालत ने केंद्र के इस तर्क से सहमति जताई और कहा कि इस प्रावधान की भाषा को केवल शाब्दिक रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने कहा कि इस विशेष संदर्भ में “या” का अर्थ “और” के समान है। उन्होंने माना कि यदि इसे “या” के रूप में पढ़ा जाए, तो यह व्याख्या न केवल विधायी मंशा के विपरीत होगी बल्कि राज्य पर अनुचित बोझ भी डालेगी। ऐसा करने से अधिग्रहण की वैध कार्यवाहियों पर प्रश्न उठेंगे और सार्वजनिक हित के प्रोजेक्ट्स प्रभावित होंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने भूमि का अधिग्रहण कर लिया है, तो मुआवजे का भुगतान न होने के आधार पर अधिग्रहण समाप्त नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने “भुगतान” शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि राज्य द्वारा मुआवजे की पेशकश करना ही पर्याप्त है। भुगतान का अर्थ यह नहीं है कि राशि अनिवार्य रूप से भूमि मालिक के बैंक खाते में जमा हो या अदालत में रखी जाए। यदि भूमि मालिक ने मुआवजा लेने से इनकार कर दिया या किसी कारणवश भुगतान नहीं लिया गया, तो अधिग्रहण रद्द नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि “भुगतान” और “जमा” दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं और उन्हें एक समान नहीं माना जा सकता। संसद का उद्देश्य भी दोनों शब्दों को अलग रखना था, इसलिए यह तर्क गलत है कि भुगतान तभी पूरा होगा जब मुआवजा अदालत या बैंक खाते में जमा हो।
“भौतिक स्वामित्व” को लेकर भी न्यायालय ने स्थिति स्पष्ट की। न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि एक बार अधिग्रहण का निर्णय लिया जाता है और ज्ञापन जारी होता है, तो राज्य भूमि का मालिक बन जाता है। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि राज्य पुराने भूमि मालिक को बलपूर्वक हटा दे या कब्जा भौतिक रूप से अपने हाथ में ले। उन्होंने इसे “कानूनी स्वामित्व” बताया, जो भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 16 के तहत स्वतः राज्य को प्राप्त हो जाता है।
फैसले में धारा 24 के उपप्रावधान की भी व्याख्या की गई। अदालत ने कहा कि यह उपप्रावधान केवल धारा 24(2)(बी) के संदर्भ में लागू होता है। इसका अर्थ यह है कि यह प्रावधान केवल उन मामलों में उपयोग किया जा सकता है, जहाँ अधिकांश भूस्वामियों को मुआवजा नहीं दिया गया है। न्यायालय ने माना कि उपप्रावधान को पूरी धारा 24 पर लागू नहीं किया जा सकता।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पुणे नगर निगम बनाम हरकचंद मिसिरमल सोलंकी (2014) के फैसले को असंवैधानिक ठहराते हुए खारिज कर दिया। उस फैसले में यह कहा गया था कि यदि मुआवजा अदालत या भूमि मालिक के खाते में जमा नहीं किया गया, तो अधिग्रहण समाप्त माना जाएगा। लेकिन इंदौर विकास प्राधिकरण के इस निर्णय में अदालत ने कहा कि मुआवजे की पेशकश ही पर्याप्त है और अधिग्रहण तब तक वैध रहेगा जब तक दोनों शर्तें — भूमि का स्वामित्व न लेना और मुआवजा न देना — पूरी न हों।
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने अपने फैसले में यह भी कहा कि भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही जो पहले ही पूरी हो चुकी है, उसे धारा 24(2) के आधार पर दोबारा नहीं खोला जा सकता। यह धारा केवल उन मामलों में लागू होगी, जो 2013 के नए कानून के लागू होने से पांच वर्ष पहले तक लंबित थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालतों द्वारा दिए गए किसी भी अंतरिम आदेश की अवधि इस पांच वर्ष की गणना में शामिल नहीं की जाएगी।
इस निर्णय ने वर्षों से चली आ रही कानूनी अस्पष्टता को खत्म कर दिया और भूमि अधिग्रहण कानून के तहत चल रहे हजारों मुकदमों की दिशा तय कर दी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह स्थापित किया कि 2013 का अधिनियम राज्य के अधिग्रहण अधिकारों को कमजोर नहीं करता, बल्कि केवल पारदर्शिता और न्यायसंगत मुआवजे की गारंटी देता है। अदालत ने कहा कि मुआवजे के भुगतान में विलंब भूमि अधिग्रहण की वैधता को प्रभावित नहीं करता, और इस तरह उसने विकास परियोजनाओं के लिए एक स्थिर कानूनी ढांचा सुनिश्चित किया।
Case Details (Land Acquisition) : S.L.P. (C) NOS.9036-9038 OF 2016), INDORE DEVELOPMENT AUTHORITY VS MANOHARLAL & ORS. ETC.