अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अत्याचारों को रोकने के लिए संसद ने 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम लागू किया था। इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव या हिंसा के शिकार लोगों को न्याय मिल सके।
मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में यह माना कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। अदालत ने गिरफ्तारी या प्राथमिकी दर्ज करने से पहले जांच की आवश्यकता जैसे कुछ सुरक्षा उपाय निर्धारित किए। इन निर्देशों के बाद देशभर में व्यापक विरोध हुआ। अनुसूचित जाति और जनजाति संगठनों ने कहा कि इन कदमों से कानून का प्रभाव कम होगा और पीड़ितों को न्याय मिलने में बाधा आएगी।
विरोध के दबाव में संसद ने अगस्त 2018 में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम पारित किया। इस संशोधन में धारा 18ए जोड़ी गई, जिसके तहत प्राथमिकी दर्ज करने से पहले किसी प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं रही और गिरफ्तारी के लिए किसी वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति भी जरूरी नहीं रही। साथ ही यह भी तय किया गया कि आरोपी व्यक्ति को अग्रिम जमानत का अधिकार नहीं मिलेगा।
इन प्रावधानों को कई याचिकाओं के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है। उनका कहना था कि कानून के दुरुपयोग की संभावना को देखते हुए कुछ सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।
10 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ मामले में यह संशोधन वैध ठहराया। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने बहुमत की राय लिखते हुए कहा कि काशीनाथ महाजन के निर्देशों ने अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के पीड़ितों पर अनुचित बोझ डाला था। उन्होंने कहा कि न्यायालय कानून बनाने की सीमा को पार नहीं कर सकता क्योंकि यह अधिकार केवल संसद का है। न्यायमूर्ति मिश्रा के अनुसार गिरफ्तारी या प्राथमिकी पर रोक जैसी व्यवस्थाएं व्यावहारिक नहीं थीं और इससे कानून का उद्देश्य कमजोर पड़ता।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रारंभिक जांच केवल उन्हीं मामलों में की जा सकती है, जिनकी अनुमति ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में संविधान पीठ ने दी थी। अग्रिम जमानत के संबंध में उन्होंने कहा कि यह केवल तब दी जा सकती है जब शिकायतकर्ता प्रथम दृष्टया अपराध सिद्ध नहीं कर पाता।
न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि अग्रिम जमानत केवल बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में दी जानी चाहिए ताकि संसद की मंशा कमजोर न पड़े। उन्होंने यह भी कहा कि अधिनियम के दुरुपयोग का तर्क वास्तविकता से परे है क्योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2016 में केवल 40,801 मामले दर्ज हुए थे। न्यायमूर्ति भट के अनुसार असली समस्या यह नहीं है कि कानून का दुरुपयोग हो रहा है, बल्कि यह कि इसका पूर्ण उपयोग नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि अतिरिक्त सुरक्षा उपाय केवल पीड़ितों को न्याय प्रणाली से दूर करेंगे।
अपने फैसले में न्यायमूर्ति भट ने बंधुत्व (Fraternity) के संवैधानिक आदर्श पर भी विस्तार से चर्चा की। उनके अनुसार यह अधिनियम संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को व्यवहार में लाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि बंधुत्व का अर्थ केवल सह-अस्तित्व नहीं है, बल्कि यह एकता और समानता की गारंटी देता है, चाहे व्यक्ति की जाति, धर्म, लिंग या जन्मस्थान कुछ भी हो।
उन्होंने यह भी बताया कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 15 और 17 को व्यवहारिक रूप से लागू करता है, जिनका उद्देश्य भेदभाव और अस्पृश्यता को समाप्त करना है। उनके अनुसार बंधुत्व की अवधारणा भारतीय संविधान में तो मौजूद है, लेकिन न्यायिक रूप से इसका विकास बहुत कम हुआ है। उन्होंने कहा कि एक खंडित समाज में बंधुत्व का सिद्धांत सामाजिक एकता और न्याय की दिशा में आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः यह कहा कि एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम का 2018 संशोधन संसद की विधायी शक्ति के अनुरूप है और इसका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों की रक्षा करना है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिनियम का उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि उन लोगों को सुरक्षा देना है जो वर्षों से सामाजिक अन्याय और भेदभाव का सामना कर रहे हैं।
Case Details : WRIT PETITION [C] NO. 1015 OF 2018, PRATHVI RAJ CHAUHAN VS UNION OF INDIA & ORS.